तीर्थक पत्रिका · ब्रज धाम
भांडीरवन संपूर्ण लीला गाइड: जहाँ ब्रह्माजी ने कराया श्री राधा-कृष्ण का दिव्य गंधर्व विवाह, सिंदूर-दान विग्रह, भांडीर वट एवं वेणु-कूप का रहस्य
यमुना के पूर्वी तट (मांट तहसील) पर स्थित ब्रज के नौवें महावन "श्री भांडीरवन" की संपूर्ण यात्रा गाइड: विश्व का एकमात्र मंदिर जहाँ भगवान श्रीकृष्ण स्वयं श्रीमती राधारानी की माँग में सिंदूर भरते हुए दर्शन देते हैं और चतुर्मुख ब्रह्माजी पुरोहित बनकर वेद-मंत्र पढ़ रहे हैं, साथ ही प्राचीन भांडीर वट और वेणु-कूप की कथा।
📸 Bhandirvan & Seva Kunj Sacred Grove, Vrindavan — Sacred Darshan Gallery
| 🛕 मंदिर दर्शन व आरती त्वरित सारांश | |
|---|---|
| मुख्य आराध्य देव | सिंदूर-दान मुद्रा में श्री राधा-भांडीरबिहारी, पुरोहित रूप में चतुर्मुख ब्रह्माजी एवं श्री बलराम मुकुट मंदिर |
| स्थान | श्री भांडीरवन (छांहिरी ग्राम, मांट तहसील, यमुना के पूर्वी तट पर वंशीवट के सामने), जिला मथुरा, उत्तर प्रदेश 281202 |
| दर्शन व आरती समय | प्रातः 06:00 – दोपहर 01:00 PM | सायं 04:00 – रात्रि 08:00 PM (सोमवती अमावस्या पर विशेष मेला) |
| यात्रा का श्रेष्ठ समय | प्रातः 07:30 से 11:00 बजे के बीच यमुना पार के बेलवन (महालक्ष्मी मंदिर), मान सरोवर और भांडीरवन का संयुक्त दर्शन |
| विशेष आरती | सिंदूर-दान विवाह शृंगार आरती एवं सोमवती अमावस्या पर वेणु-कूप के जल का दुग्धवत् (दूध जैसा) होने का पर्व |
| यात्री नियम व परामर्श | दंपत्ति अखंड सौभाग्य हेतु विवाह मंडप में सिंदूर, सुहाग पिटारी व चुनरी अर्पित करते हैं; प्राचीन भांडीर वट की जमीन छूती शाखाओं की परिक्रमा करें। |
भांडीरवन संपूर्ण लीला गाइड: जहाँ ब्रह्माजी ने कराया श्री राधा-कृष्ण का दिव्य गंधर्व विवाह, सिंदूर-दान विग्रह, भांडीर वट एवं वेणु-कूप का रहस्य
यमुना के पूर्वी तट (मांट तहसील) पर स्थित ब्रज के नौवें महावन "श्री भांडीरवन" की संपूर्ण यात्रा गाइड: विश्व का एकमात्र मंदिर जहाँ भगवान श्रीकृष्ण स्वयं श्रीमती राधारानी की माँग में सिंदूर भरते हुए दर्शन देते हैं और चतुर्मुख ब्रह्माजी पुरोहित बनकर वेद-मंत्र पढ़ रहे हैं, साथ ही प्राचीन भांडीर वट और वेणु-कूप की कथा।
1. ब्रज चौरासी कोस का नौवाँ महावन: क्यों भांडीरवन में छिपा है वैष्णव इतिहास का सबसे मधुर रहस्य
वृन्दावन आने वाले अनेक जिज्ञासु श्रद्धालुओं के मन में प्रायः यह प्रश्न उठता है कि—"भगवान श्रीकृष्ण और श्रीमती राधारानी के बीच इतना अगाध प्रेम होने पर भी क्या उनका विधिवत विवाह कभी संपन्न हुआ था?" जब भी आप किसी तपोनिष्ठ ब्रजवासी संत या गर्ग संहिता के मर्मज्ञ विद्वान से यह प्रश्न पूछेंगे, तो वे मुस्कुराकर यमुना महारानी के पूर्वी तट (मांट तहसील) पर स्थित हरे-भरे कुंजों की ओर संकेत करेंगे, जहाँ ब्रज चौरासी कोस के द्वादश वनों में से नौवाँ महावन विराजमान है—'श्री भांडीरवन'। यही वह परम गोपनीय और सिद्ध भूमि है जहाँ सृष्टि के रचयिता चतुर्मुख ब्रह्माजी ने स्वयं स्वर्ग से उतरकर पुरोहित का आसन ग्रहण किया था और अनादि भांडीर वट के नीचे वैदिक अग्नि प्रज्वलित कर श्री राधारानी और भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य विवाह (पाणिग्रहण संस्कार एवं सिंदूर-दान) संपन्न कराया था!
महर्षि गर्गाचार्य रचित 'श्री गर्ग संहिता' (गोलोक खंड, अध्याय 16) और 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' (प्रकृति खंड) में इस लीला का अत्यंत रोचक वर्णन मिलता है। एक दिन जब नंद बाबा नन्हे बालक श्रीकृष्ण को साथ लेकर भांडीरवन में गायें चराने आए, तब योगमाया की प्रेरणा से अचानक आकाश में घने काले बादल छा गए और तेज आंधी-वर्षा होने लगी। उसी समय कोटि चंद्रमाओं की कांति वाली वृषभानु-नंदिनी श्रीमती राधारानी वहाँ प्रकट हुईं। नंद बाबा ने राधारानी के दिव्य तेज को पहचानकर हाथ जोड़े और अपने भयभीत लाला को उनकी गोद में सौंपते हुए कहा—"हे देवि! जब तक मैं बिछुड़ी हुई गायों को एकत्र कर के लौटूँ, तब तक तुम मेरे इस सुकुमार बालक की रक्षा करना।" जैसे ही नंद बाबा ओझल हुए, बालक कृष्ण ने तत्क्षण अपना नित्य किशोर स्वरूप धारण कर लिया, भांडीरवन के वृक्षों से मकरंद झरने लगा और चतुर्मुख ब्रह्माजी ने वेदमंत्रों का उच्चारण करते हुए श्री राधा-माधव का गंधर्व एवं वैदिक विवाह संपन्न कराया।
तीर्थक (Teerthak) आध्यात्मिक गाइड के माध्यम से भांडीरवन संपूर्ण लीला गाइड की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस पावन तीर्थ के शास्त्रीय इतिहास और रस-सिद्धांत को समझते हुए दर्शन करें। यहाँ का प्रत्येक आँगन, स्तंभ और कुंड सोलहवीं शताब्दी के रसिक आचार्यों एवं षड्गोस्वामियों की प्रत्यक्ष साधना का साक्षी है।
2. गर्ग संहिता एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण का प्रमाण: जब नंद बाबा की गोद से उतरकर बालक कृष्ण ने रचाया राधा-विवाह
इस मंदिर एवं लीला-स्थली की दैनिक सेवा-पद्धति सैकड़ों वर्षों से चली आ रही वंशानुगत गोस्वामी एवं आचार्य परंपरा के अनुसार अत्यंत नियमपूर्वक संपन्न होती है। प्रातःकाल आम भक्तों के लिए पट खुलने से पूर्व ही पुजारीगण पंचामृत अभिषेक, केसर-चंदन अंगराग और ऋतु के अनुकूल ताजे वन-पुष्पों से ठाकुर जी का नयनाभिराम शृंगार करते हैं।
क्योंकि वृन्दावन, मांट और नंदगाँव के सभी देवालयों में ग्रीष्मकालीन सेवा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन पूर्णिमा) और शीतकालीन सेवा (कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से फाल्गुन पूर्णिमा) के अनुसार दर्शन समय में 30 से 45 मिनट का अंतर आता है, इसलिए यात्रा से पूर्व 'तीर्थक ब्रज वैष्णव पंचांग' पर सूर्योदय एवं आरती का समय अवश्य देख लें।
दोपहर के राजभोग और रात्रि के शयन भोग के समय जब मंदिर के पर्दे लगते हैं, तब यह स्मरण कराया जाता है कि ब्रज में ठाकुर जी की सेवा किसी पाषाण या धातु की मूर्ति के रूप में नहीं, अपितु घर के साक्षात् जीवंत स्वामी और सुकुमार लाल के रूप में की जाती है।
ब्रज के प्राचीन रसिक ग्रंथों—जैसे श्री हित चौरासी, श्री केलिमाल, भक्तिरसामृतसिंधु और स्कंद पुराण के मथुरा माहात्म्य—में इस पावन तीर्थ की प्रत्येक सीढ़ी, झरोखे, वट-वृक्ष और सरोवर को जड़ पाषाण न मानकर साक्षात् चिन्मय (सच्चिदानंदमय) स्वरूप वर्णित किया गया है। संसार के अन्य ऐतिहासिक स्मारक समय के साथ केवल संग्रहालय बनकर रह जाते हैं, किंतु वृन्दावन, भांडीरवन और नंदगाँव की यह पावन भूमि आज भी प्रातः 04:30 बजे की मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन पर्यंत चलने वाली अखंड अष्टयाम सेवा से जीवंत रहती है। जब कोई श्रद्धालु यहाँ चंदन-केसर की सुगंध, पखावज और मंजीरों के साथ गूँजते समाज-गायन तथा तुलसी की माला फेरते ब्रजवासी संतों के दर्शन करता है, तो उसका हृदय स्वतः ही सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर अलौकिक आनंद में डूब जाता है।
3. सिंदूर-दान गर्भगृह दर्शन: चतुर्मुख ब्रह्माजी के समक्ष श्री राधारानी की माँग भरते श्यामसुंदर
इस पावन स्थल की स्थापत्य कला और प्राचीन वृक्षों की संरचना में गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। धौलपुर के लाल बलुआ पत्थर, मकराना के संगमरमर और प्राचीन लाखौरी ईंटों से बने झरोखे, कमल-आकृतियाँ तथा वट-कदंब की झुकती हुई शाखाएँ यात्री के चंचल मन को शांत कर सीधे श्री विग्रह के चरणारविंदों में जोड़ देती हैं।
मुख्य गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा मार्ग, प्राचीन कूप (कुंड) और भजन कुटीरें स्थित हैं, जहाँ पिछले पाँच सौ वर्षों में अनगिनत सिद्ध संतों ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से नाम-जप किया है। जब आप शांत चित्त से "श्री राधे-श्याम" या "राधावल्लभ श्री हरिवंश" का उच्चारण करते हुए चार परिक्रमा लगाते हैं, तो आपके चरण उन महान संतों की चरण-रज से पवित्र हो जाते हैं।
वरिष्ठ नागरिकों और परिवारों के लिए प्रातः 06:30 से 09:30 बजे के मध्य का समय दर्शन के लिए सर्वोत्तम रहता है, क्योंकि इस समय वातावरण अत्यंत शांत रहता है और आप बिना किसी धक्का-मुक्की के गर्भगृह की देहरी के समीप खड़े होकर ठाकुर जी की रूप-माधुरी को निहार सकते हैं।
4. प्रत्यक्ष साक्षी "भांडीर वट": भूमि को प्रणाम करती विशाल शाखाएँ और श्याम-गौर वृक्षों का आलिंगन
मुख्य मंदिर के अतिरिक्त इसके आसपास स्थित उप-तीर्थ, बैठकें और लीला-कुंज इस यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं। ब्रज के आध्यात्मिक मानचित्र में कोई भी मंदिर अकेला नहीं है; प्रत्येक देवालय वृन्दावन के कुंजों, नंदगाँव-बरसाना की पहाड़ियों और यमुना के घाटों को जोड़ने वाली एक दिव्य मणिमाला का हिस्सा है।
जब आप पास ही स्थित सरोवर या समाधि स्थल के किनारे दस मिनट शांत बैठकर स्वामी हरिदास जी, हित हरिवंश महाप्रभु, सूरदास जी अथवा रूप-सनातन गोस्वामी के पदों का स्मरण करते हैं, तब आपको अनुभव होता है कि आज भी इन वृक्षों के नीचे गोलोक की नित्य लीला अखंड रूप से चल रही है।
जो साधक अपनी यात्रा में दर्शन किए गए कुंडों, प्राचीन वट-वृक्षों और संतों की समाधियों का विवरण अपनी डायरी या 'तीर्थक ऐप' में संजोकर रखते हैं, उन्हें घर लौटने के बाद भी अपने दैनिक भजन और मानसी-सेवा में अद्भुत एकाग्रता प्राप्त होती है।
5. वेणु-कूप (बंशी कुआँ): सोमवती अमावस्या का दुग्ध-जल चमत्कार एवं श्री बलदाऊ मुकुट मंदिर
वर्ष के बारह महीनों में यहाँ ऋतुओं के अनुसार भव्य उत्सव मनाए जाते हैं—ज्येष्ठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी में सुगंधित 'फूल बंगला' और 'चंदन यात्रा', श्रावण में 'हरियाली तीज हिंडोला', भाद्रपद में 'राधाष्टमी व जन्माष्टमी', आश्विन में 'शरद पूर्णिमा महारास', कार्तिक में 'दीपदान व नियम सेवा', पौष में 'खिचड़ी महोत्सव' और फाल्गुन में 'लठमार व फूलों की होली'।
यदि आप किसी सामान्य दिन भी यहाँ दर्शन करने आते हैं, तो संध्या आरती के समय पखावज, सारंगी और हारमोनियम पर गाए जाने वाले पारंपरिक 'समाज-गायन' और अष्टयाम पदों को सुनकर आपको साक्षात् उत्सव का ही दिव्य आनंद प्राप्त होगा।
फोटोग्राफी के शौकीन यात्रियों के लिए बाहरी प्रांगण, गोपुरम, सरोवर और प्राचीन वट-वृक्ष प्रातःकालीन सुनहरी धूप में अत्यंत सुंदर दृश्य प्रस्तुत करते हैं, जबकि मुख्य गर्भगृह में मोबाइल कैमरा बंद रखकर केवल नेत्रों से ही ठाकुर जी की छवि को हृदय में बसाना चाहिए।
ब्रज के प्राचीन रसिक ग्रंथों—जैसे श्री हित चौरासी, श्री केलिमाल, भक्तिरसामृतसिंधु और स्कंद पुराण के मथुरा माहात्म्य—में इस पावन तीर्थ की प्रत्येक सीढ़ी, झरोखे, वट-वृक्ष और सरोवर को जड़ पाषाण न मानकर साक्षात् चिन्मय (सच्चिदानंदमय) स्वरूप वर्णित किया गया है। संसार के अन्य ऐतिहासिक स्मारक समय के साथ केवल संग्रहालय बनकर रह जाते हैं, किंतु वृन्दावन, भांडीरवन और नंदगाँव की यह पावन भूमि आज भी प्रातः 04:30 बजे की मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन पर्यंत चलने वाली अखंड अष्टयाम सेवा से जीवंत रहती है। जब कोई श्रद्धालु यहाँ चंदन-केसर की सुगंध, पखावज और मंजीरों के साथ गूँजते समाज-गायन तथा तुलसी की माला फेरते ब्रजवासी संतों के दर्शन करता है, तो उसका हृदय स्वतः ही सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर अलौकिक आनंद में डूब जाता है।
6. भांडीरवन की अन्य लीलाएँ: दावाग्नि पान, प्रलंबासुर वध एवं ग्वाल-बालों की छकौड़ी लीला
मंदिर का तुलसी-मिश्रित चरणामृत, चंदन और मिट्टी के कुल्हड़/दोने में मिलने वाला 'महाप्रसाद' (जैसे पेड़ा, रबड़ी, मक्खन-मिश्री या मसालेदार खिचड़ी) ग्रहण करना ब्रज यात्रा का अनिवार्य अंग है। राजभोग और संध्या आरती के पश्चात मंदिर के अधिकृत प्रसाद पटल से ही महाप्रसाद प्राप्त करें।
निधिवन, राधा वल्लभ घेरा, भांडीरवन और नंदगाँव की सीढ़ियों पर बंदरों की संख्या अधिक होने के कारण अपने चश्मे (Eyeglasses), मोबाइल फोन और पर्स को वाहन से उतरने से पूर्व ही बैग के भीतर सुरक्षित रख लें। ब्रज के किसी भी जीव या वृक्ष को कष्ट न पहुँचाएँ और धाम की मर्यादा का पालन करें।
धाम-सेवा के अंतर्गत परिक्रमा मार्ग और कुंडों के घाटों पर प्लास्टिक या दोने-पत्तल न फैलाएँ, तथा यात्रा के प्रारंभ और समापन पर पावन 'ब्रजरज' को अपने मस्तक पर अवश्य धारण करें।
7. यमुना पूर्वी तट की एक-दिवसीय यात्रा: बेलवन, मान सरोवर और भांडीरवन का सुगम मार्ग
यातायात की दृष्टि से अपनी यात्रा को भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार संयोजित करना सबसे बुद्धिमानी है। मध्य वृन्दावन के देवालयों (श्री राधा वल्लभ मंदिर, निधिवन राज और श्री रंगनाथ मंदिर) का दर्शन आप चुंगी चौराहा या विद्यापीठ चौराहे से ई-रिक्शा और पैदल मार्ग द्वारा एक ही पाली में सुगमता से कर सकते हैं।
दूसरी ओर, यमुना पार स्थित 'श्री भांडीरवन-बेलवन-मान सरोवर' अथवा 'बरसाना-नंदगाँव-टेर कदंब-पावन सरोवर' की यात्रा के लिए प्रातः 06:30 बजे वृन्दावन से निजी टैक्सी या ब्रज परिक्रमा वाहन लेकर निकलना उत्तम रहता है, जिससे आप दोपहर तक सभी लीला-स्थलों के दर्शन कर सायंकाल संध्या आरती के लिए पुनः वृन्दावन लौट सकें।
अपने स्मार्टफोन में 'तीर्थक (Teerthak) ऐप' अवश्य रखें, जिससे आपको ऑफलाइन जीपीएस मैप, ग्रीष्म/शीतकालीन मंदिर बंद होने का लाइव अलर्ट और आज का वृन्दावन वैष्णव पंचांग एक ही स्थान पर प्राप्त होता रहे—जय जय श्री राधे श्याम!
🇮🇳 हिंदी और Hinglish यात्री खोज सहायता (Hindi & Hinglish Pilgrim Guide)
भांडीरवन संपूर्ण लीला गाइड: जहाँ ब्रह्माजी ने कराया श्री राधा-कृष्ण का दिव्य गंधर्व विवाह, सिंदूर-दान विग्रह, भांडीर वट एवं वेणु-कूप का रहस्य — यदि आप वृन्दावन, मथुरा, गोवर्धन या बरसाना यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो तीर्थक (Teerthak App) पर मंदिर खुलने और बंद होने का लाइव समय, मंगला और श्रृंगार आरती टाइमिंग, परिक्रमा जीपीएस मैप और एकादशी पंचांग हिंदी तथा अंग्रेजी में उपलब्ध हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: क्या पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और श्रीमती राधारानी का विवाह हुआ था? भांडीरवन में क्या लीला हुई थी?
हाँ! ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खंड) और गर्ग संहिता (गोलोक खंड, अध्याय 16) में विस्तार से वर्णन है कि जब नंद बाबा बालक कृष्ण को लेकर भांडीरवन में गायें चराने गए, तब योगमाया से अचानक मेघ घिर आए और वहाँ श्रीमती राधारानी पधारीं। नंद बाबा ने कृष्ण को राधारानी की गोद में सौंप दिया। तत्क्षण बालक कृष्ण ने किशोर रूप धारण कर लिया और स्वयं चतुर्मुख ब्रह्माजी ने आकाश से उतरकर भांडीर वट के नीचे अग्नि प्रज्वलित की तथा पुरोहित बनकर वेद-मंत्रों से श्री राधा-कृष्ण का पाणिग्रहण संस्कार, सप्तपदी और सिंदूर-दान संपन्न कराया!
प्रश्न 2: भांडीरवन के विवाह मंडप में विराजमान श्री राधा-कृष्ण का विग्रह संपूर्ण विश्व में सबसे अनूठा क्यों है?
विश्व के अन्य सभी मंदिरों में श्रीकृष्ण मुरली बजाते हुए या गिरिराज धारण किए हुए दिखते हैं, किंतु केवल भांडीरवन के विवाह मंडप में भगवान श्रीकृष्ण अपने दाहिने हाथ से श्रीमती राधारानी की माँग में लाल सिंदूर भरते हुए ("सिंदूर-दान मुद्रा") विराजमान हैं, और उनके ठीक सामने चतुर्मुख ब्रह्माजी हाथ में पोथी लिए हवन कुंड के पास पुरोहित के रूप में बैठे हैं।
प्रश्न 3: भांडीरवन स्थित "वेणु-कूप" (बंशी कुआँ) का क्या रहस्य है और सोमवती अमावस्या पर यहाँ क्या चमत्कार होता है?
भांडीरवन में गोचारण और विवाह लीला के पश्चात जब श्री राधारानी और सखाओं को तीव्र प्यास लगी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बंशी (वेणु) की नोक से धरती में छेद कर मीठे जल का कुआँ प्रकट किया, जिसे "वेणु-कूप" कहा जाता है। मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन इस कुएँ का जल दूध के समान श्वेत आभा ले लेता है, जिसके स्नान व आचमन से संतान और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
प्रश्न 4: भांडीरवन के प्राचीन "भांडीर वट" और यहाँ के आपस में लिपटे हुए वृक्षों की क्या विशेषता है?
भांडीरवन में स्थित सहस्रों वर्ष प्राचीन "भांडीर वट" की विशाल शाखाएँ धरती की ओर झुककर ब्रजरज को स्पर्श करती हैं और फिर पुनः ऊपर की ओर उठ जाती हैं—मानो वे आज भी प्रिया-प्रियतम के विवाह में दंडवत प्रणाम कर रही हों। यहाँ अनेक वृक्षों में श्याम वर्ण के तमाल और गौर वर्ण के कदंब/पीपल की शाखाएँ एक ही जड़ से आलिंगनबद्ध होकर उगी हुई हैं।
प्रश्न 5: वृन्दावन से भांडीरवन कार द्वारा या यमुना पोंटून पुल (पीपा पुल) के रास्ते कैसे पहुँचा जा सकता है?
सड़क मार्ग से वृन्दावन के पानीगाँव यमुना पुल को पार कर मांट (Mantt) तहसील मार्ग से लगभग 26 किलोमीटर (40 मिनट) में सीधे भांडीरवन पहुँचा जा सकता है। शीतकाल में जब यमुना पर पोंटून पुल (पीपा पुल) चालू रहता है, तब यात्री पहले बेलवन (महालक्ष्मी मंदिर) व मान सरोवर के दर्शन करते हुए मात्र 12 किमी आगे भांडीरवन पहुँच जाते हैं।
तीर्थक (Teerthak) के साथ करें दिव्य ब्रज यात्रा
कभी भी दर्शन या आरती न छूटने दें। मंदिर खुलने-बंद होने का लाइव काउंटडाउन, भीड़ हीटमैप, ऑफलाइन 21 किमी गोवर्धन परिक्रमा जीपीएस, और प्रामाणिक वैदिक पंचांग हिंदी में।
स्रोत एवं संपादकीय टिप्पणी
यह लेख गौरव सिंह सोलंकी (संस्थापक व आध्यात्मिक शोधकर्ता) द्वारा शोधित है। मंदिर समय व सेवा नियमों में परिवर्तन संभव है; यात्रा से पूर्व मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि करें।
- जिला प्रशासन मथुरा (https://mathura.nic.in)
- श्री बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट (https://bihariji.org)
- प्रेम मंदिर आधिकारिक समय (https://premmandir.org.in)
- इस्कॉन वृन्दावन मीडिया सेल (https://iskconvrindavan.com)