तीर्थक पत्रिका · ब्रज धाम
श्री दाऊजी मंदिर (बलदेव) संपूर्ण यात्रा गाइड: ब्रज-राज भगवान बलराम का 8 फीट ऊँचा विशाल विग्रह, क्षीर सागर कुंड एवं विश्व-प्रसिद्ध दाऊजी हुरंगा होली
मथुरा से 22 किमी पूर्व (यमुना पार) स्थित ब्रज के राजा "श्री दाऊजी महाराज" (बलदेव) मंदिर की संपूर्ण यात्रा गाइड: क्यों दाऊजी के दर्शन बिना वृन्दावन यात्रा अधूरी मानी जाती है, सन् 1535 ई. में क्षीर सागर से प्रकट हुए 8 फीट ऊँचे वज्रनाभ-कालीन विग्रह का रहस्य, और चैत्र कृष्ण द्वितीया का विश्व-प्रसिद्ध "दाऊजी का हुरंगा"।
📸 Shri Dauji Maharaj Temple, Baldeo & Garud Govind Dham — Sacred Darshan Gallery
| 🛕 मंदिर दर्शन व आरती त्वरित सारांश | |
|---|---|
| मुख्य आराध्य देव | 8 फीट ऊँचे कसौटी पाषाण के श्री दाऊजी महाराज (भगवान बलराम) एवं उनके सम्मुख विराजमान माता रेवती मैया |
| स्थान | बलदेव नगर (विद्रुमवन), मथुरा से गोकुल बैराज होकर 22 किमी पूर्व एवं महावन से 10 किमी आगे, जिला मथुरा, उत्तर प्रदेश 281301 |
| दर्शन व आरती समय | प्रातः 06:00 – दोपहर 12:30 PM | सायं 04:00 – रात्रि 09:00 PM (मंदिर के पीछे स्थित क्षीर सागर कुंड सदैव खुला रहता है) |
| यात्रा का श्रेष्ठ समय | प्रातः 08:00 से 11:30 बजे गोकुल, रमण रेती, ब्रह्मांड घाट और चौरासी खंभा के साथ संयुक्त यात्रा में |
| विशेष आरती | बलदेव छठ (हलषष्ठी जन्मोत्सव), अगहन पूर्णिमा प्राकट्य मेला एवं होली के दूसरे दिन का विश्व-प्रसिद्ध "दाऊजी का हुरंगा" |
| यात्री नियम व परामर्श | दाऊजी के सम्मुख दर्शन के साथ-साथ परिक्रमा में पीछे की खिड़की से "पीठ दर्शन" अवश्य करें; माखन-मिश्री व पेड़े का भोग लगाएँ। |
श्री दाऊजी मंदिर (बलदेव) संपूर्ण यात्रा गाइड: ब्रज-राज भगवान बलराम का 8 फीट ऊँचा विशाल विग्रह, क्षीर सागर कुंड एवं विश्व-प्रसिद्ध दाऊजी हुरंगा होली
मथुरा से 22 किमी पूर्व (यमुना पार) स्थित ब्रज के राजा "श्री दाऊजी महाराज" (बलदेव) मंदिर की संपूर्ण यात्रा गाइड: क्यों दाऊजी के दर्शन बिना वृन्दावन यात्रा अधूरी मानी जाती है, सन् 1535 ई. में क्षीर सागर से प्रकट हुए 8 फीट ऊँचे वज्रनाभ-कालीन विग्रह का रहस्य, और चैत्र कृष्ण द्वितीया का विश्व-प्रसिद्ध "दाऊजी का हुरंगा"।
1. "ब्रज के राजा दाऊजी": क्यों बड़े भैया बलराम के दर्शन बिना अधूरी मानी जाती है चौरासी कोस की यात्रा
मथुरा से गोकुल बैराज पार कर मात्र बाईस किलोमीटर पूर्व की ओर (रमण रेती और महावन से दस किलोमीटर आगे) प्राचीन 'विद्रुमवन' की भूमि पर लाल बलुआ पत्थर के मजबूत किलेनुमा परकोटे के भीतर उत्तर भारत का एक अत्यंत प्राचीन, जागृत और शक्तिशाली देवालय विराजमान है—बलदेव नगर स्थित 'श्री दाऊजी महाराज मंदिर'। ब्रज की लोक-परंपरा और रसिक सिद्धांत में जहाँ नंदनंदन श्रीकृष्ण को माखनचोर और गोपियों का प्राणधन माना जाता है, वहीं उनके बड़े भैया भगवान श्री बलराम (हलधर / अनंत शेष) को संपूर्ण ब्रज मंडल का एकछत्र सम्राट और रक्षक माना जाता है—इसीलिए प्रत्येक ब्रजवासी गर्व से कहता है: "ब्रज के राजा दाऊजी महाराज!" शास्त्रीय मान्यता है कि यदि कोई यात्री मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन और बरसाना के दर्शन कर ले, किंतु बलदेव जाकर बड़े भैया दाऊजी के चरणों में हाजिरी न लगाए, तो उसकी ब्रज यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती, क्योंकि बलराम जी ही 'आदि-गुरु तत्त्व' हैं जिनकी कृपा से कृष्ण-प्रेम का द्वार खुलता है।
किले के समान ऊँचे द्वारों को पार कर जब श्रद्धालु दाऊजी मंदिर के गर्भगृह के सामने पहुँचता है, तो नेत्र विस्मय से खुले रह जाते हैं: वहाँ कसौटी के काले पाषाण से निर्मित आठ फीट ऊँचा और साढ़े तीन फीट चौड़ा श्री दाऊजी महाराज का भव्य स्वयंभू विग्रह खड़ा है, जिसकी प्रतिष्ठा पाँच हजार वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण के प्रपौत्र महाराज वज्रनाभ ने की थी। दाऊजी के मस्तक के ऊपर शेषनाग के सात विशाल फन छत्र बनाए हुए हैं, उनका दाहिना हाथ भक्तों को निर्भय करने की मुद्रा में कंधे से ऊपर उठा हुआ है, बाएँ हाथ में वारुणी (मधु) का चषक है, और उनके ठीक सामने की कोठरी में उनकी अर्धांगिनी महाराज ककुद्मी की पुत्री 'माता रेवती मैया' विराजमान हैं।
तीर्थक (Teerthak) आध्यात्मिक गाइड के माध्यम से श्री दाऊजी मंदिर (बलदेव) संपूर्ण यात्रा गाइड की यात्रा करने वाले प्रत्येक श्रद्धालु के लिए यह आवश्यक है कि वह इस पावन तीर्थ के शास्त्रीय इतिहास, पौराणिक प्रमाण और ब्रज की जीवंत सेवा-परंपरा को समझते हुए दर्शन करे। यहाँ का प्रत्येक आँगन, सोपान और वृक्ष महान सिद्ध संतों की अखंड साधना से अभिमंत्रित है।
ब्रज के प्राचीन रसिक एवं वैष्णव ग्रंथों—जैसे श्री हित चौरासी, श्री केलिमाल, भक्तिरसामृतसिंधु, षट्-संदर्भ और स्कंद पुराण के मथुरा माहात्म्य—में इस पावन तीर्थ की प्रत्येक सीढ़ी, झरोखे, वट-वृक्ष और सरोवर को जड़ पाषाण न मानकर साक्षात् चिन्मय (सच्चिदानंदमय) स्वरूप वर्णित किया गया है। संसार के अन्य ऐतिहासिक स्मारक समय के साथ केवल संग्रहालय बनकर रह जाते हैं, किंतु वृन्दावन, बलदेव और यमुना तट की यह पावन भूमि आज भी प्रातः 04:30 बजे की मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन पर्यंत चलने वाली अखंड अष्टयाम सेवा से जीवंत रहती है। जब कोई श्रद्धालु यहाँ चंदन-केसर की सुगंध, पखावज और मंजीरों के साथ गूँजते समाज-गायन तथा तुलसी की माला फेरते ब्रजवासी संतों के दर्शन करता है, तो उसका हृदय स्वतः ही सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर अलौकिक आनंद में डूब जाता है।
2. राजा वज्रनाभ से सन् 1535 ई. के क्षीर सागर प्राकट्य तक: 8 फीट ऊँचे श्री विग्रह का अद्भुत इतिहास
इस पावन धाम की दैनिक पूजा और सेवा-पद्धति सैकड़ों वर्षों से चली आ रही वंशानुगत आचार्य एवं गोस्वामी परंपरा के अनुसार अत्यंत निष्ठापूर्वक संपन्न होती है। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में आम भक्तों के लिए पट खुलने से पूर्व ही पुजारीगण पंचामृत स्नान, सुगंधित चंदन-केसर लेपन और ऋतु के अनुकूल ताजे पुष्पों से श्री विग्रह का नयनाभिराम शृंगार करते हैं।
क्योंकि वृन्दावन, बलदेव और यमुना तटीय आश्रमों में ग्रीष्मकालीन सेवा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन पूर्णिमा) और शीतकालीन सेवा (कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से फाल्गुन पूर्णिमा) के अनुसार दर्शन समय में 30 से 45 मिनट का अंतर आता है, इसलिए प्रस्थान से पूर्व 'तीर्थक ब्रज वैष्णव पंचांग' पर सूर्योदय एवं आरती का समय अवश्य देख लें।
ब्रज के प्राचीन रसिक ग्रंथों—जैसे श्री हित चौरासी, श्री केलिमाल, भक्तिरसामृतसिंधु और स्कंद पुराण के मथुरा माहात्म्य—में इस पावन तीर्थ की प्रत्येक सीढ़ी, झरोखे, वट-वृक्ष और सरोवर को जड़ पाषाण न मानकर साक्षात् चिन्मय (सच्चिदानंदमय) स्वरूप वर्णित किया गया है। संसार के अन्य ऐतिहासिक स्मारक समय के साथ केवल संग्रहालय बनकर रह जाते हैं, किंतु ब्रज की यह पावन भूमि आज भी प्रातः 04:30 बजे की मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन पर्यंत चलने वाली अखंड अष्टयाम सेवा से जीवंत रहती है।
3. श्री दाऊजी महाराज एवं माता रेवती का स्वरूप दर्शन: शेषनाग छत्र, अभय हस्त एवं पीछे से "पीठ दर्शन"
इस मंदिर एवं तपोभूमि की वास्तुकला और परिक्रमा मार्ग में गहरा आध्यात्मिक विज्ञान निहित है। चाहे आप राधा दामोदर मंदिर में गिरिराज शिला की चार परिक्रमा कर रहे हों, पागल बाबा मंदिर की नौ संगमरमर मंजिलों पर चढ़ रहे हों, माँ कात्यायनी पीठ के शांत मंडप में मंत्र-जप कर रहे हों, बलदेव में आठ फीट ऊँचे दाऊजी महाराज को निहार रहे हों अथवा यमुना पार देवराहा बाबा के काष्ठ-मचान के नीचे खड़े हों—यहाँ का वातावरण मन के समस्त विक्षेपों को तुरंत शांत कर देता है।
वरिष्ठ नागरिकों (65 वर्ष से अधिक) और छोटे बच्चों के साथ आने वाले परिवारों के लिए प्रातः 06:30 से 09:30 बजे का समय दर्शन के लिए सर्वोत्तम रहता है, जब संगमरमर का फर्श शीतल रहता है और बिना किसी भीड़ के गर्भगृह के समीप खड़े होकर दर्शन सुलभ होते हैं।
मंदिर मर्यादा का सदैव पालन करें: मुख्य गर्भगृह के भीतर फ्लैश फोटोग्राफी या रील बनाने से बचें, अपने मोबाइल फोन को शांत (Silent) रखें और दोनों हाथ जोड़कर श्री विग्रह के चरण-कमलों से लेकर मुस्कुराते हुए मुखारविंद तक को अपने हृदय में बसाएँ।
4. जब भँवरों की सेना ने भगाया औरंगजेब की फौज को: विद्रुमवन के इस अपराजेय दुर्ग का चमत्कार
मुख्य देवालय के साथ-साथ इसके परिसर में स्थित पवित्र सरोवर (जैसे बलदेव का क्षीर सागर, राधा दामोदर की समाधि वाटिका, या यमुना घाट) और प्राचीन गौशालाओं का दर्शन करने से ही यात्रा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। ब्रज चौरासी कोस की परंपरा में प्रत्येक मुख्य मंदिर अपने निकटवर्ती कुंड और भजन कुटीर से जुड़ा हुआ है।
दर्शन के उपरांत मंदिर के चौक या कुंड की सीढ़ियों पर दस मिनट शांत बैठकर हरे कृष्ण महामंत्र, कात्यायनी महामंत्र अथवा देवराहा बाबा के सिद्ध मंत्र ("कृष्णाय वासुदेवाय...") की एक माला (108 मनके) का जप अवश्य करें।
जो भक्त अपनी यात्रा में दर्शन किए गए श्री विग्रहों, संत समाधियों और कुंडों का विवरण अपनी डायरी या 'तीर्थक ऐप' में सुरक्षित रखते हैं, उन्हें घर लौटने के पश्चात भी अपने दैनिक ध्यान और नाम-जप में ब्रज-वास का सजीव अनुभव होता रहता है।
ब्रज के प्राचीन रसिक एवं वैष्णव ग्रंथों—जैसे श्री हित चौरासी, श्री केलिमाल, भक्तिरसामृतसिंधु, षट्-संदर्भ और स्कंद पुराण के मथुरा माहात्म्य—में इस पावन तीर्थ की प्रत्येक सीढ़ी, झरोखे, वट-वृक्ष और सरोवर को जड़ पाषाण न मानकर साक्षात् चिन्मय (सच्चिदानंदमय) स्वरूप वर्णित किया गया है। संसार के अन्य ऐतिहासिक स्मारक समय के साथ केवल संग्रहालय बनकर रह जाते हैं, किंतु वृन्दावन, बलदेव और यमुना तट की यह पावन भूमि आज भी प्रातः 04:30 बजे की मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन पर्यंत चलने वाली अखंड अष्टयाम सेवा से जीवंत रहती है। जब कोई श्रद्धालु यहाँ चंदन-केसर की सुगंध, पखावज और मंजीरों के साथ गूँजते समाज-गायन तथा तुलसी की माला फेरते ब्रजवासी संतों के दर्शन करता है, तो उसका हृदय स्वतः ही सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर अलौकिक आनंद में डूब जाता है।
5. पावन क्षीर सागर (बलभद्र कुंड) स्नान एवं गोस्वामी कल्याण देव जी के वंशजों की सेवा-परंपरा
वर्ष के बारह महीनों में यहाँ ऋतुओं के अनुसार भव्य उत्सव मनाए जाते हैं—ग्रीष्म ऋतु में सुगंधित 'फूल बंगला' और 'चंदन यात्रा', श्रावण में 'झूलन हिंडोला', भाद्रपद में 'श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व बलदेव छठ', आश्विन-चैत्र में 'नवरात्रि महायज्ञ', कार्तिक में 'दामोदर दीपदान', मार्गशीर्ष में 'कात्यायनी व्रत व प्राकट्य उत्सव' और फाल्गुन-चैत्र में 'ब्रज की होली व दाऊजी का हुरंगा'।
जब कोई श्रद्धालु यहाँ चंदन-केसर की सुगंध, पखावज और मंजीरों के साथ गूँजते समाज-गायन तथा तुलसी की माला फेरते ब्रजवासी संतों के दर्शन करता है, तो उसका हृदय स्वतः ही सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर अलौकिक आनंद में डूब जाता है।
प्रस्थान से पूर्व मंदिर के अधिकृत पटल से तुलसी-मिश्रित चरणामृत एवं महाप्रसाद अवश्य ग्रहण करें, तथा आश्रम की गौशाला में गायों को हरा चारा व गुड़ समर्पित करें।
6. विश्व-प्रसिद्ध "दाऊजी का हुरंगा" (होली दूज) एवं भाद्रपद बलदेव छठ (हलषष्ठी) जन्मोत्सव
धाम-निष्ठा और ब्रज की स्वच्छता प्रत्येक यात्री का पावन कर्तव्य है। मंदिर की रसोई में शुद्ध देसी गाय के घी से निर्मित महाप्रसाद—चाहे वह माखन-मिश्री हो, मथुरा का पेड़ा हो, रबड़ी हो या खिचड़ी—को आदरपूर्वक ग्रहण करने के पश्चात पत्तल और दोने केवल निर्धारित कूड़ेदान में ही डालें।
वृन्दावन की गलियों में बंदरों से अपने चश्मे, मोबाइल फोन और पर्स की सुरक्षा हेतु उन्हें वाहन से उतरते समय ही बैग के भीतर रख लें। ब्रज के समस्त जीवों, गायों, मयूरों और प्राचीन वृक्षों को भगवान के पार्षद मानकर उनका सम्मान करें।
यात्रा के प्रारंभ और समापन पर पावन 'ब्रजरज' को प्रणाम कर अपने मस्तक पर अवश्य धारण करें।
7. गोकुल, रमण रेती, ब्रह्मांड घाट और बलदेव (दाऊजी) की संयुक्त अर्ध-दिवसीय यात्रा मार्गदर्शिका
समय और ऊर्जा की बचत के लिए अपनी यात्रा को भौगोलिक क्रम में नियोजित करें। वृन्दावन नगर के भीतर स्थित तीर्थों—श्री राधा दामोदर मंदिर, पागल बाबा मंदिर, कात्यायनी शक्तिपीठ और केशी घाट के सामने यमुना पार देवराहा बाबा आश्रम—का दर्शन आप ई-रिक्शा और 5 मिनट की नौका यात्रा द्वारा एक ही दिन में सुगमता से कर सकते हैं।
वहीं दूसरी ओर, यमुना के पूर्वी तट पर स्थित गोकुल, रमण रेती, ब्रह्मांड घाट, महावन (चौरासी खंभा) और बलदेव स्थित 'श्री दाऊजी महाराज मंदिर' की यात्रा गोकुल बैराज मार्ग से प्रातः 4 घंटे में अत्यंत आनंदपूर्वक संपन्न हो जाती है।
अपने फोन में 'तीर्थक (Teerthak) ऐप' अवश्य रखें, जिससे आपको लाइव आरती काउंटडाउन, ऑफलाइन परिक्रमा मैप और आज का वृन्दावन वैष्णव पंचांग तुरंत उपलब्ध रहे—जय जय श्री राधे श्याम! दाऊजी महाराज की जय!
🇮🇳 हिंदी और Hinglish यात्री खोज सहायता (Hindi & Hinglish Pilgrim Guide)
श्री दाऊजी मंदिर (बलदेव) संपूर्ण यात्रा गाइड: ब्रज-राज भगवान बलराम का 8 फीट ऊँचा विशाल विग्रह, क्षीर सागर कुंड एवं विश्व-प्रसिद्ध दाऊजी हुरंगा होली — यदि आप वृन्दावन, मथुरा, गोवर्धन या बरसाना यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो तीर्थक (Teerthak App) पर मंदिर खुलने और बंद होने का लाइव समय, मंगला और श्रृंगार आरती टाइमिंग, परिक्रमा जीपीएस मैप और एकादशी पंचांग हिंदी तथा अंग्रेजी में उपलब्ध हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: ब्रजवासी भगवान श्रीकृष्ण के स्थान पर बड़े भैया श्री बलदाऊ जी को "ब्रज का राजा" क्यों कहते हैं?
ब्रज की प्राचीन लोक-मान्यता है कि श्रीकृष्ण तो गोपियों के सखा और माखनचोर हैं, किंतु ब्रज के वास्तविक रक्षक और सम्राट बड़े भैया बलराम जी हैं—इसीलिए कहा जाता है "ब्रज के राजा दाऊजी!" वैष्णव सिद्धांत में बलराम जी "आदि-गुरु" तत्त्व हैं; बड़े भाई और गुरु रूपी दाऊजी की आज्ञा व कृपा के बिना किसी भी जीव को श्री राधा-कृष्ण की अंतरंग भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती।
प्रश्न 2: सन् 1535 ई. में क्षीर सागर कुंड के भीतर से श्री दाऊजी महाराज का 8 फीट ऊँचा विशाल विग्रह कैसे प्रकट हुआ था?
श्रीकृष्ण के प्रपौत्र राजा वज्रनाभ द्वारा 5,000 वर्ष पूर्व प्रतिष्ठित यह विशाल प्रतिमा मुगल आक्रमणों के समय तालाब में छिपा दी गई थी। सन् 1535 ई. (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) को महाप्रभु वल्लभाचार्य के पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ जी और तपस्वी कल्याण देव जी ने देखा कि एक श्यामा गाय प्रतिदिन झाड़ियों में जाकर स्वतः अपने थनों से दूध की धार बहाती है। खुदाई करने पर वहाँ से 8 फीट ऊँचे श्री दाऊजी महाराज और माता रेवती के विग्रह प्रकट हुए, तथा दूध से भरा वह कुंड "क्षीर सागर" कहलाया।
प्रश्न 3: जब मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना दाऊजी मंदिर को तोड़ने के लिए बलदेव की ओर बढ़ी, तब क्या चमत्कार हुआ था?
इतिहास के अनुसार सन् 1670 ई. में जब औरंगजेब की सेना मंदिर तोड़ने के लिए बलदेव की ओर बढ़ी, तो दाऊजी की माया से पूरी सेना रास्ता भटककर किसी दूसरे गाँव में पहुँच गई। जब कुछ सैनिक किसी प्रकार मंदिर के निकट पहुँचे, तो गर्भगृह से करोड़ों विशाल भँवरों और मधुमक्खियों के झुंड ने हमला कर सैनिकों को भगा दिया, जिसके बाद भयभीत मुगल सूबेदार ने मंदिर के नाम माफीनामा और जागीर लिखकर क्षमा माँगी!
प्रश्न 4: दाऊजी मंदिर की परिक्रमा करते समय पीछे की खिड़की से ठाकुर जी के "पीठ दर्शन" करने का क्या रहस्य है?
सामने से देखने पर दाऊजी महाराज की 8 फीट ऊँची प्रतिमा अत्यंत सुंदर नक्काशीदार है, जिनके सिर पर शेषनाग के सात फन हैं, दाहिना हाथ अभय मुद्रा में ऊपर उठा है और बाएँ हाथ में वारुणी का पात्र है। किंतु परिक्रमा मार्ग की पिछली खिड़की से देखने पर विग्रह की पीठ अपरिष्कृत प्राकृतिक शिला के रूप में दिखती है, जो प्रमाणित करती है कि यह एक स्वयंभू और दिव्य पाषाण स्वरूप है।
प्रश्न 5: होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण द्वितीया) बलदेव में होने वाला "दाऊजी का हुरंगा" पूरे विश्व में क्यों प्रसिद्ध है?
जहाँ बरसाना में डंडों से लठमार होली खेली जाती है, वहीं होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण द्वितीया) को दाऊजी मंदिर के विशाल चौक में संपूर्ण ब्रज की होली का मुकुटमणि—"दाऊजी का हुरंगा"—आयोजित होता है। इसमें पांडे समाज की महिलाएँ (हुरियारिनें) पुरुषों (हुरियारों) के भीगे कुर्ते फाड़कर उनके कपड़े के कोड़े बनाती हैं और छत से सैकड़ों मन टेसू के केसरिया रंग व गुलाल की वर्षा के बीच अद्भुत प्रेम-हुरंगा खेलती हैं!
तीर्थक (Teerthak) के साथ करें दिव्य ब्रज यात्रा
कभी भी दर्शन या आरती न छूटने दें। मंदिर खुलने-बंद होने का लाइव काउंटडाउन, भीड़ हीटमैप, ऑफलाइन 21 किमी गोवर्धन परिक्रमा जीपीएस, और प्रामाणिक वैदिक पंचांग हिंदी में।
स्रोत एवं संपादकीय टिप्पणी
यह लेख गौरव सिंह सोलंकी (संस्थापक व आध्यात्मिक शोधकर्ता) द्वारा शोधित है। मंदिर समय व सेवा नियमों में परिवर्तन संभव है; यात्रा से पूर्व मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि करें।
- जिला प्रशासन मथुरा (https://mathura.nic.in)
- श्री बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट (https://bihariji.org)
- प्रेम मंदिर आधिकारिक समय (https://premmandir.org.in)
- इस्कॉन वृन्दावन मीडिया सेल (https://iskconvrindavan.com)