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तीर्थक पत्रिका · ब्रज धाम

श्री राधा वल्लभ मंदिर वृन्दावन: गद्दी सेवा व दर्शन समय गाइड

श्री राधा वल्लभ मंदिर वृन्दावन दर्शन गाइड: पवित्र गद्दी सेवा रहस्य, सप्त आरती समय, हित हरिवंश महाप्रभु प्राकट्य कथा एवं शीतकालीन खिचड़ी उत्सव।

📅 2026-09-23 ⏱️ 20 मिनट पठन ✍️ गौरव सिंह सोलंकी सत्यापित ब्रज यात्रा गाइड
Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan — श्री राधा वल्लभ मंदिर वृन्दावन: गद्दी सेवा व दर्शन समय गाइड
🛕 Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan

📸 Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan — Sacred Darshan Gallery

Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan Vrindavan Braj Dham — Darshan View 2 (Shri Radha Vallabh Mandir Vrindavan Darshan Guide)
Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan — Sacred Darshan (2)
Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan Vrindavan Braj Dham — Darshan View 3 (Shri Radha Vallabh Mandir Vrindavan Darshan Guide)
Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan — Sacred Darshan (3)
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Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan — Sacred Darshan (4)
Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan Vrindavan Braj Dham — Darshan View 5 (Shri Radha Vallabh Mandir Vrindavan Darshan Guide)
Shri Radha Vallabh Mandir, Vrindavan — Sacred Darshan (5)
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🛕 मंदिर दर्शन व आरती त्वरित सारांश
मुख्य आराध्य देवश्री राधा वल्लभ लाल (वेणु-वादन करते स्वयंभू श्रीकृष्ण) एवं श्रीमती राधारानी की पावन गद्दी व स्वर्ण मुकुट (गद्दी सेवा)
स्थानराधा वल्लभ घेरा, गौतम पाड़ा एवं बांके बिहारी मार्ग के निकट, वृन्दावन, उत्तर प्रदेश 281121
दर्शन व आरती समयग्रीष्मकाल: प्रातः 05:00 – 12:00 PM एवं सायं 06:00 – 09:00 PM | शीतकाल: प्रातः 05:30 – 12:00 PM एवं सायं 05:30 – 08:30 PM
यात्रा का श्रेष्ठ समयप्रातः 07:00 से 09:30 बजे शृंगार एवं समाज-गायन हेतु, अथवा सायं 06:30 बजे संध्या आरती एवं ब्याहुला पद श्रवण हेतु
विशेष आरतीसप्त दैनिक आरती, रात्रि ब्याहुला उत्सव (नित्य विवाह पद) एवं पौष मास का एक-मासीय छद्म-वेश खिचड़ी महोत्सव
यात्री नियम व परामर्शगर्भगृह में फोटोग्राफी पूर्णतः वर्जित है; मंदिर के चौक में बैठकर शांत भाव से हित-चौरासी के समाज-गायन का श्रवण करें।

श्री राधा वल्लभ मंदिर वृन्दावन: गद्दी सेवा व दर्शन समय गाइड

श्री राधा वल्लभ मंदिर वृन्दावन दर्शन गाइड: पवित्र गद्दी सेवा रहस्य, सप्त आरती समय, हित हरिवंश महाप्रभु प्राकट्य कथा एवं शीतकालीन खिचड़ी उत्सव।

1. रसिक उपासना का मुकुटमणि: क्यों श्री राधा वल्लभ लाल के नेत्र हर भक्त का चित्त चुरा लेते हैं

श्री बांके बिहारी मंदिर से मात्र तीन सौ मीटर की दूरी पर गौतम पाड़ा के समीप 'राधा वल्लभ घेरा' की शांत गलियों में रसिक संप्रदाय का सर्वोच्च केंद्र विराजमान है—श्री राधा वल्लभ मंदिर। पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज (राधा केली कुंज) सहित देश-विदेश के करोड़ों राधा-नाम उपासकों के लिए यह पावन देवालय 'निकुंज-रस उपासना' का प्राण-केंद्र है, जहाँ श्रीमती राधारानी को वृन्दावन की एकमात्र स्वामिनी और नंदनंदन श्रीकृष्ण को उनके अनन्य प्रेमी सेवक ('राधा-वल्लभ') के रूप में भजा जाता है।

जब कोई श्रद्धालु पहली बार मंदिर के जगमोहन में खड़ा होकर गर्भगृह की ओर निहारता है, तो उसे एक अत्यंत अद्भुत आध्यात्मिक रहस्य का दर्शन होता है: यद्यपि यह संप्रदाय पूर्णतः श्री राधारानी की प्रधानता पर आधारित है, तथापि यहाँ श्री राधा वल्लभ लाल के वाम भाग में राधारानी की कोई धातु या पाषाण की मूर्ति स्थापित नहीं है! इसके स्थान पर त्रिभंगी ललित मुद्रा में वेणु बजाते हुए श्यामसुंदर के बगल में एक मखमली सिंहासन (गद्दी) सजाया जाता है, जिस पर स्वर्ण-पत्र में 'श्री राधा' अंकित मुकुट विराजमान रहता है। ब्रज में इसे 'गद्दी सेवा' कहा जाता है, जिसका भाव यह है कि श्री राधारानी का सौंदर्य इतना अगाध है कि उसे किसी प्रतिमा में सीमित नहीं किया जा सकता; स्वयं ठाकुर जी ही उनकी गद्दी की ओर निहारते हुए उनकी चाकरी में खड़े हैं।

तीर्थक (Teerthak) आध्यात्मिक गाइड के माध्यम से श्री राधा वल्लभ मंदिर वृन्दावन संपूर्ण गाइड की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस पावन तीर्थ के शास्त्रीय इतिहास और रस-सिद्धांत को समझते हुए दर्शन करें। यहाँ का प्रत्येक आँगन, स्तंभ और कुंड सोलहवीं शताब्दी के रसिक आचार्यों एवं षड्गोस्वामियों की प्रत्यक्ष साधना का साक्षी है।

💡 यात्री परामर्श: Radha Vallabh temple lanes are narrow; store footwear at designated stalls outside and secure spectacles against mischievous monkeys.

2. गद्दी सेवा का गूढ़ रहस्य: क्यों ठाकुर जी के वाम भाग में राधारानी की मूर्ति नहीं अपितु स्वर्ण गद्दी है

इस मंदिर एवं लीला-स्थली की दैनिक सेवा-पद्धति सैकड़ों वर्षों से चली आ रही वंशानुगत गोस्वामी एवं आचार्य परंपरा के अनुसार अत्यंत नियमपूर्वक संपन्न होती है। प्रातःकाल आम भक्तों के लिए पट खुलने से पूर्व ही पुजारीगण पंचामृत अभिषेक, केसर-चंदन अंगराग और ऋतु के अनुकूल ताजे वन-पुष्पों से ठाकुर जी का नयनाभिराम शृंगार करते हैं।

क्योंकि वृन्दावन, मांट और नंदगाँव के सभी देवालयों में ग्रीष्मकालीन सेवा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन पूर्णिमा) और शीतकालीन सेवा (कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से फाल्गुन पूर्णिमा) के अनुसार दर्शन समय में 30 से 45 मिनट का अंतर आता है, इसलिए यात्रा से पूर्व 'तीर्थक ब्रज वैष्णव पंचांग' पर सूर्योदय एवं आरती का समय अवश्य देख लें।

दोपहर के राजभोग और रात्रि के शयन भोग के समय जब मंदिर के पर्दे लगते हैं, तब यह स्मरण कराया जाता है कि ब्रज में ठाकुर जी की सेवा किसी पाषाण या धातु की मूर्ति के रूप में नहीं, अपितु घर के साक्षात् जीवंत स्वामी और सुकुमार लाल के रूप में की जाती है।

ब्रज के प्राचीन रसिक ग्रंथों—जैसे श्री हित चौरासी, श्री केलिमाल, भक्तिरसामृतसिंधु और स्कंद पुराण के मथुरा माहात्म्य—में इस पावन तीर्थ की प्रत्येक सीढ़ी, झरोखे, वट-वृक्ष और सरोवर को जड़ पाषाण न मानकर साक्षात् चिन्मय (सच्चिदानंदमय) स्वरूप वर्णित किया गया है। संसार के अन्य ऐतिहासिक स्मारक समय के साथ केवल संग्रहालय बनकर रह जाते हैं, किंतु वृन्दावन, भांडीरवन और नंदगाँव की यह पावन भूमि आज भी प्रातः 04:30 बजे की मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन पर्यंत चलने वाली अखंड अष्टयाम सेवा से जीवंत रहती है। जब कोई श्रद्धालु यहाँ चंदन-केसर की सुगंध, पखावज और मंजीरों के साथ गूँजते समाज-गायन तथा तुलसी की माला फेरते ब्रजवासी संतों के दर्शन करता है, तो उसका हृदय स्वतः ही सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर अलौकिक आनंद में डूब जाता है।

3. भगवान शिव के हृदय से चरथावल और वृन्दावन मदन-टेर तक: स्वयंभू श्री विग्रह की प्राकट्य कथा

इस पावन स्थल की स्थापत्य कला और प्राचीन वृक्षों की संरचना में गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। धौलपुर के लाल बलुआ पत्थर, मकराना के संगमरमर और प्राचीन लाखौरी ईंटों से बने झरोखे, कमल-आकृतियाँ तथा वट-कदंब की झुकती हुई शाखाएँ यात्री के चंचल मन को शांत कर सीधे श्री विग्रह के चरणारविंदों में जोड़ देती हैं।

मुख्य गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा मार्ग, प्राचीन कूप (कुंड) और भजन कुटीरें स्थित हैं, जहाँ पिछले पाँच सौ वर्षों में अनगिनत सिद्ध संतों ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से नाम-जप किया है। जब आप शांत चित्त से "श्री राधे-श्याम" या "राधावल्लभ श्री हरिवंश" का उच्चारण करते हुए चार परिक्रमा लगाते हैं, तो आपके चरण उन महान संतों की चरण-रज से पवित्र हो जाते हैं।

वरिष्ठ नागरिकों और परिवारों के लिए प्रातः 06:30 से 09:30 बजे के मध्य का समय दर्शन के लिए सर्वोत्तम रहता है, क्योंकि इस समय वातावरण अत्यंत शांत रहता है और आप बिना किसी धक्का-मुक्की के गर्भगृह की देहरी के समीप खड़े होकर ठाकुर जी की रूप-माधुरी को निहार सकते हैं।

💡 यात्री परामर्श: प्रातः 07:00 से 09:30 बजे शृंगार एवं समाज-गायन हेतु, अथवा सायं 06:30 बजे संध्या आरती एवं ब्याहुला पद श्रवण हेतु — गर्भगृह में फोटोग्राफी पूर्णतः वर्जित है; मंदिर के चौक में बैठकर शांत भाव से हित-चौरासी के समाज-गायन का श्रवण करें।

4. अष्टयाम की सप्त आरती समय सारिणी एवं नित्य रात्रि "ब्याहुला उत्सव" समाज-गायन

मुख्य मंदिर के अतिरिक्त इसके आसपास स्थित उप-तीर्थ, बैठकें और लीला-कुंज इस यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं। ब्रज के आध्यात्मिक मानचित्र में कोई भी मंदिर अकेला नहीं है; प्रत्येक देवालय वृन्दावन के कुंजों, नंदगाँव-बरसाना की पहाड़ियों और यमुना के घाटों को जोड़ने वाली एक दिव्य मणिमाला का हिस्सा है।

जब आप पास ही स्थित सरोवर या समाधि स्थल के किनारे दस मिनट शांत बैठकर स्वामी हरिदास जी, हित हरिवंश महाप्रभु, सूरदास जी अथवा रूप-सनातन गोस्वामी के पदों का स्मरण करते हैं, तब आपको अनुभव होता है कि आज भी इन वृक्षों के नीचे गोलोक की नित्य लीला अखंड रूप से चल रही है।

जो साधक अपनी यात्रा में दर्शन किए गए कुंडों, प्राचीन वट-वृक्षों और संतों की समाधियों का विवरण अपनी डायरी या 'तीर्थक ऐप' में संजोकर रखते हैं, उन्हें घर लौटने के बाद भी अपने दैनिक भजन और मानसी-सेवा में अद्भुत एकाग्रता प्राप्त होती है।

5. पौष मास खिचड़ी महोत्सव: मेवा-युक्त गर्म खिचड़ी भोग और ठाकुर जी के 30 अनूठे छद्म-वेश

वर्ष के बारह महीनों में यहाँ ऋतुओं के अनुसार भव्य उत्सव मनाए जाते हैं—ज्येष्ठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी में सुगंधित 'फूल बंगला' और 'चंदन यात्रा', श्रावण में 'हरियाली तीज हिंडोला', भाद्रपद में 'राधाष्टमी व जन्माष्टमी', आश्विन में 'शरद पूर्णिमा महारास', कार्तिक में 'दीपदान व नियम सेवा', पौष में 'खिचड़ी महोत्सव' और फाल्गुन में 'लठमार व फूलों की होली'।

यदि आप किसी सामान्य दिन भी यहाँ दर्शन करने आते हैं, तो संध्या आरती के समय पखावज, सारंगी और हारमोनियम पर गाए जाने वाले पारंपरिक 'समाज-गायन' और अष्टयाम पदों को सुनकर आपको साक्षात् उत्सव का ही दिव्य आनंद प्राप्त होगा।

फोटोग्राफी के शौकीन यात्रियों के लिए बाहरी प्रांगण, गोपुरम, सरोवर और प्राचीन वट-वृक्ष प्रातःकालीन सुनहरी धूप में अत्यंत सुंदर दृश्य प्रस्तुत करते हैं, जबकि मुख्य गर्भगृह में मोबाइल कैमरा बंद रखकर केवल नेत्रों से ही ठाकुर जी की छवि को हृदय में बसाना चाहिए।

ब्रज के प्राचीन रसिक ग्रंथों—जैसे श्री हित चौरासी, श्री केलिमाल, भक्तिरसामृतसिंधु और स्कंद पुराण के मथुरा माहात्म्य—में इस पावन तीर्थ की प्रत्येक सीढ़ी, झरोखे, वट-वृक्ष और सरोवर को जड़ पाषाण न मानकर साक्षात् चिन्मय (सच्चिदानंदमय) स्वरूप वर्णित किया गया है। संसार के अन्य ऐतिहासिक स्मारक समय के साथ केवल संग्रहालय बनकर रह जाते हैं, किंतु वृन्दावन, भांडीरवन और नंदगाँव की यह पावन भूमि आज भी प्रातः 04:30 बजे की मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन पर्यंत चलने वाली अखंड अष्टयाम सेवा से जीवंत रहती है। जब कोई श्रद्धालु यहाँ चंदन-केसर की सुगंध, पखावज और मंजीरों के साथ गूँजते समाज-गायन तथा तुलसी की माला फेरते ब्रजवासी संतों के दर्शन करता है, तो उसका हृदय स्वतः ही सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर अलौकिक आनंद में डूब जाता है।

6. स्थापत्य विरासत: सन् 1585 का लाल पत्थर वाला प्राचीन हित मंदिर एवं वर्तमान हवेली

मंदिर का तुलसी-मिश्रित चरणामृत, चंदन और मिट्टी के कुल्हड़/दोने में मिलने वाला 'महाप्रसाद' (जैसे पेड़ा, रबड़ी, मक्खन-मिश्री या मसालेदार खिचड़ी) ग्रहण करना ब्रज यात्रा का अनिवार्य अंग है। राजभोग और संध्या आरती के पश्चात मंदिर के अधिकृत प्रसाद पटल से ही महाप्रसाद प्राप्त करें।

निधिवन, राधा वल्लभ घेरा, भांडीरवन और नंदगाँव की सीढ़ियों पर बंदरों की संख्या अधिक होने के कारण अपने चश्मे (Eyeglasses), मोबाइल फोन और पर्स को वाहन से उतरने से पूर्व ही बैग के भीतर सुरक्षित रख लें। ब्रज के किसी भी जीव या वृक्ष को कष्ट न पहुँचाएँ और धाम की मर्यादा का पालन करें।

धाम-सेवा के अंतर्गत परिक्रमा मार्ग और कुंडों के घाटों पर प्लास्टिक या दोने-पत्तल न फैलाएँ, तथा यात्रा के प्रारंभ और समापन पर पावन 'ब्रजरज' को अपने मस्तक पर अवश्य धारण करें।

💡 यात्री परामर्श: प्रातः 07:00 से 09:30 बजे शृंगार एवं समाज-गायन हेतु, अथवा सायं 06:30 बजे संध्या आरती एवं ब्याहुला पद श्रवण हेतु — गर्भगृह में फोटोग्राफी पूर्णतः वर्जित है; मंदिर के चौक में बैठकर शांत भाव से हित-चौरासी के समाज-गायन का श्रवण करें।

7. पूज्य प्रेमानंद जी महाराज की हित-उपासना परंपरा, दर्शन शिष्टाचार एवं पहुँचने का सुगम मार्ग

यातायात की दृष्टि से अपनी यात्रा को भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार संयोजित करना सबसे बुद्धिमानी है। मध्य वृन्दावन के देवालयों (श्री राधा वल्लभ मंदिर, निधिवन राज और श्री रंगनाथ मंदिर) का दर्शन आप चुंगी चौराहा या विद्यापीठ चौराहे से ई-रिक्शा और पैदल मार्ग द्वारा एक ही पाली में सुगमता से कर सकते हैं।

दूसरी ओर, यमुना पार स्थित 'श्री भांडीरवन-बेलवन-मान सरोवर' अथवा 'बरसाना-नंदगाँव-टेर कदंब-पावन सरोवर' की यात्रा के लिए प्रातः 06:30 बजे वृन्दावन से निजी टैक्सी या ब्रज परिक्रमा वाहन लेकर निकलना उत्तम रहता है, जिससे आप दोपहर तक सभी लीला-स्थलों के दर्शन कर सायंकाल संध्या आरती के लिए पुनः वृन्दावन लौट सकें।

अपने स्मार्टफोन में 'तीर्थक (Teerthak) ऐप' अवश्य रखें, जिससे आपको ऑफलाइन जीपीएस मैप, ग्रीष्म/शीतकालीन मंदिर बंद होने का लाइव अलर्ट और आज का वृन्दावन वैष्णव पंचांग एक ही स्थान पर प्राप्त होता रहे—जय जय श्री राधे श्याम!

🇮🇳 हिंदी और Hinglish यात्री खोज सहायता (Hindi & Hinglish Pilgrim Guide)

श्री राधा वल्लभ मंदिर वृन्दावन: गद्दी सेवा व दर्शन समय गाइड — यदि आप वृन्दावन, मथुरा, गोवर्धन या बरसाना यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो तीर्थक (Teerthak App) पर मंदिर खुलने और बंद होने का लाइव समय, मंगला और श्रृंगार आरती टाइमिंग, परिक्रमा जीपीएस मैप और एकादशी पंचांग हिंदी तथा अंग्रेजी में उपलब्ध हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: श्री राधा वल्लभ मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के साथ श्रीमती राधारानी की मूर्ति के स्थान पर "गद्दी सेवा" क्यों होती है?

गोस्वामी श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा स्थापित राधा-वल्लभ संप्रदाय में श्रीमती राधारानी को सर्वोपरि आराध्या माना जाता है, जिनका अनिर्वचनीय सौंदर्य किसी धातु की प्रतिमा में बाँधा नहीं जा सकता। इसलिए श्री राधा वल्लभ लाल के वाम भाग में मखमली सिंहासन पर स्वर्ण मुकुट व पटल (गद्दी) विराजमान रहता है, जिसे "गद्दी सेवा" कहा जाता है।

प्रश्न 2: श्री राधा वल्लभ लाल का स्वयंभू विग्रह श्री हित हरिवंश महाप्रभु को किस प्रकार प्राप्त हुआ था?

पौराणिक इतिहास के अनुसार भगवान आशुतोष (शिवजी) ने कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर चरथावल निवासी ब्राह्मण आत्मदेव को अपने हृदय में स्थित यह श्रीविग्रह प्रदान किया था। सन् 1534 ई. में जब श्री हित हरिवंश महाप्रभु वृन्दावन जा रहे थे, तब स्वप्न में आज्ञा पाकर उन्होंने आत्मदेव की पुत्रियों से विवाह किया और कन्यादान में प्राप्त श्री राधा वल्लभ लाल को वृन्दावन के मदन टेर पर प्रतिष्ठित किया।

प्रश्न 3: श्री राधा वल्लभ मंदिर में प्रतिदिन रात्रि को होने वाला "ब्याहुला उत्सव" (नित्य विवाह लीला) क्या है?

जहाँ अन्य मंदिरों में वर्ष में एक बार विवाह उत्सव होता है, वहीं श्री राधा वल्लभ मंदिर की निकुंज-उपासना में प्रिया-प्रियतम का मिलन नित्य-नवीन माना जाता है। अतः यहाँ प्रतिदिन संध्या आरती और शयन आरती के मध्य "ब्याहुला उत्सव" मनाया जाता है, जिसमें समाज-गायक विवाह के मंगल पद गाते हैं।

प्रश्न 4: पौष मास का प्रसिद्ध "खिचड़ी महोत्सव" क्या है जिसमें श्री राधा वल्लभ जी प्रतिदिन अलग-अलग छद्म-वेश धारण करते हैं?

पौष मास की कड़ाके की ठंड (दिसंबर-जनवरी) में प्रातः 05:30 बजे ठाकुर जी को मेवे, अदरक और देसी घी से युक्त गर्म खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। इस पूरे महीने ठाकुर जी श्रीमती राधारानी को रिझाने के लिए प्रतिदिन नया छद्म-वेश (कभी मनिहारिन, कभी वैद्य, कभी मालिन तो कभी सिपाही) धारण कर अद्भुत दर्शन देते हैं।

प्रश्न 5: वर्तमान मंदिर के समीप स्थित प्राचीन लाल पत्थर वाला "हित मंदिर" (पुराना राधा वल्लभ मंदिर) किसने बनवाया था?

वर्तमान मंदिर से सटा हुआ लाल बलुआ पत्थर का विशाल प्राचीन मंदिर सन् 1585 ई. में गोस्वामी वनचंद्र जी की प्रेरणा से रहीम खानखाना के दीवान सुंदरदास भटनागर द्वारा निर्मित कराया गया था। आज इस प्राचीन मंदिर को "श्री हित मंदिर" कहा जाता है, जहाँ महाप्रभु जी की चरण-पादुकाओं का पूजन होता है।

तीर्थक (Teerthak) के साथ करें दिव्य ब्रज यात्रा

कभी भी दर्शन या आरती न छूटने दें। मंदिर खुलने-बंद होने का लाइव काउंटडाउन, भीड़ हीटमैप, ऑफलाइन 21 किमी गोवर्धन परिक्रमा जीपीएस, और प्रामाणिक वैदिक पंचांग हिंदी में।

स्रोत एवं संपादकीय टिप्पणी

यह लेख गौरव सिंह सोलंकी (संस्थापक व आध्यात्मिक शोधकर्ता) द्वारा शोधित है। मंदिर समय व सेवा नियमों में परिवर्तन संभव है; यात्रा से पूर्व मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि करें।

  1. जिला प्रशासन मथुरा (https://mathura.nic.in)
  2. श्री बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट (https://bihariji.org)
  3. प्रेम मंदिर आधिकारिक समय (https://premmandir.org.in)
  4. इस्कॉन वृन्दावन मीडिया सेल (https://iskconvrindavan.com)
संपादकीय मानक: यह लेख किसी भी अपुष्ट दावे या शुल्क को प्रकाशित नहीं करता। तीर्थयात्रियों के लिए पूर्णतः सत्यापित जानकारी।