तीर्थक पत्रिका · ब्रज धाम
श्री रंगनाथ मंदिर (रंगजी मंदिर) वृन्दावन संपूर्ण गाइड: 50 फीट स्वर्ण गरुड़ स्तंभ, दक्षिण भारतीय स्थापत्य, गोदा-रंगमन्नार कथा एवं रथ का मेला
सन् 1851 में निर्मित वृन्दावन के सबसे विशाल देवालय श्री रंगनाथ मंदिर (रंगजी मंदिर) की संपूर्ण यात्रा गाइड: क्यों संत कवयित्री गोदांबा (आंडाल) के हठ पर भगवान रंगनाथ ने शेषशायी मुद्रा छोड़कर दूल्हे का वेश धारण किया, 50 फीट ऊँचा स्वर्ण ध्वज-स्तंभ, द्रविड़ गोपुरम वास्तुकला और 10-दिवसीय ब्रह्मोत्सव (रथ का मेला)।
📸 Sri Rangji Mandir (Sri Goda-Rangamannar Temple), Vrindavan — Sacred Darshan Gallery
| 🛕 मंदिर दर्शन व आरती त्वरित सारांश | |
|---|---|
| मुख्य आराध्य देव | श्री गोदा-रंगमन्नार (दूल्हे के वेश में श्रीकृष्ण, वामांग में श्री गोदांबा/आंडाल एवं गरुड़ जी) तथा शेषशायी नारायण |
| स्थान | गोदाविहार, मथुरा-वृन्दावन मार्ग (चुंगी चौराहा एवं गोपीनाथ बाजार के समीप), वृन्दावन, उत्तर प्रदेश 281121 |
| दर्शन व आरती समय | ग्रीष्मकाल: प्रातः 05:30 – 10:30 AM एवं सायं 04:00 – 09:00 PM | शीतकाल: प्रातः 06:00 – 11:00 AM एवं सायं 03:30 – 08:00 PM |
| यात्रा का श्रेष्ठ समय | प्रातः 07:00 से 09:30 बजे सूर्य की किरणों में 50 फीट ऊँचे स्वर्ण स्तंभ और दक्षिण भारतीय वैदिक अर्चना के दर्शन हेतु |
| विशेष आरती | चैत्र मास का 10-दिवसीय ब्रह्मोत्सव (रथ का मेला व लठ्ठ का मेला), वैकुंठ एकादशी स्वर्ग-द्वार दर्शन एवं पुष्करिणी नौका विहार |
| यात्री नियम व परामर्श | यह मंदिर शुद्ध पांचरात्र आगम विधि से संचालित होता है; बाहरी पाँच प्रांगणों और स्वर्ण स्तंभ तक सभी जा सकते हैं; गर्भगृह में मर्यादित वस्त्र आवश्यक हैं। |
श्री रंगनाथ मंदिर (रंगजी मंदिर) वृन्दावन संपूर्ण गाइड: 50 फीट स्वर्ण गरुड़ स्तंभ, दक्षिण भारतीय स्थापत्य, गोदा-रंगमन्नार कथा एवं रथ का मेला
सन् 1851 में निर्मित वृन्दावन के सबसे विशाल देवालय श्री रंगनाथ मंदिर (रंगजी मंदिर) की संपूर्ण यात्रा गाइड: क्यों संत कवयित्री गोदांबा (आंडाल) के हठ पर भगवान रंगनाथ ने शेषशायी मुद्रा छोड़कर दूल्हे का वेश धारण किया, 50 फीट ऊँचा स्वर्ण ध्वज-स्तंभ, द्रविड़ गोपुरम वास्तुकला और 10-दिवसीय ब्रह्मोत्सव (रथ का मेला)।
1. वृन्दावन की भूमि पर दक्षिण का श्रीरंगम: 22 एकड़ में फैले इस अद्भुत देवालय का निर्माण इतिहास
मथुरा-वृन्दावन मुख्य मार्ग पर चुंगी चौराहे के समीप पहुँचते ही जब यात्रियों की दृष्टि आकाश को छूते हुए बहु-मंजिला द्रविड़ 'गोपुरम' पर पड़ती है, तो एक क्षण के लिए ऐसा प्रतीत होता है मानो उत्तर भारत के ब्रज मंडल में साक्षात् दक्षिण भारत का श्रीरंगम या कांचीपुरम उतर आया हो। बाईस एकड़ से अधिक भूमि पर सात विशाल परकोटों (सप्त-प्राकार) के भीतर निर्मित 'श्री रंगनाथ मंदिर'—जिसे ब्रजवासी प्रेम से 'रंगजी का मंदिर' कहते हैं—संपूर्ण वृन्दावन धाम का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे विशाल और स्थापत्य कला का सबसे अनूठा देवालय है। सन् 1845 से 1851 ई. के मध्य मथुरा के सुप्रसिद्ध धन्नासेठ लक्ष्मीचंद के भ्राताओं—सेठ गोविंददास और सेठ राधाकिशन—द्वारा अपने गुरुदेव श्री वैष्णव संप्रदाय के प्रकांड विद्वान स्वामी रंगाचार्य जी महाराज की प्रेरणा से निर्मित यह मंदिर दक्षिण भारतीय पांचरात्र आगम परंपरा और राजपूती स्थापत्य का अद्वितीय संगम है।
किंतु इस मंदिर का सबसे बड़ा आध्यात्मिक रहस्य इसके गर्भगृह में छिपा है। दक्षिण भारत के समस्त रंगनाथ मंदिरों में भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर लेटे हुए (शेषशायी मुद्रा में) विराजमान होते हैं, परंतु वृन्दावन के रंगजी मंदिर में भगवान रंगनाथ शैया छोड़कर अपने दोनों चरणों पर खड़े हैं और हाथ में सोने की छड़ी लिए हुए एक राजसी दूल्हे (वर) के वेश में दर्शन देते हैं! इसके पीछे आठवीं शताब्दी की महान आलवार महिला संत श्री गोदांबा (आंडाल) की अनन्य प्रेम-गाथा है। गोदांबा ने प्रतिदिन अपने केशों में पुष्पमाला पहनकर भगवान को अर्पित की और प्रतिज्ञा ली कि वे केवल वृन्दावन के नंदनंदन श्रीकृष्ण से ही विवाह करेंगी। भक्त की इसी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए श्रीरंगम के भगवान रंगनाथ अपनी योगनिद्रा त्यागकर वृन्दावन पधारे और 'श्री गोदा-रंगमन्नार' (गोदा के दूल्हे) के रूप में यहाँ नित्य विराजमान हो गए।
तीर्थक (Teerthak) आध्यात्मिक गाइड के माध्यम से श्री रंगनाथ मंदिर (रंगजी मंदिर) वृन्दावन संपूर्ण गाइड की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस पावन तीर्थ के शास्त्रीय इतिहास और रस-सिद्धांत को समझते हुए दर्शन करें। यहाँ का प्रत्येक आँगन, स्तंभ और कुंड सोलहवीं शताब्दी के रसिक आचार्यों एवं षड्गोस्वामियों की प्रत्यक्ष साधना का साक्षी है।
2. आलवार संत गोदांबा (आंडाल) की प्रेम प्रतिज्ञा: क्यों शेषशायी नारायण वृन्दावन में दूल्हा बनकर खड़े हुए
इस मंदिर एवं लीला-स्थली की दैनिक सेवा-पद्धति सैकड़ों वर्षों से चली आ रही वंशानुगत गोस्वामी एवं आचार्य परंपरा के अनुसार अत्यंत नियमपूर्वक संपन्न होती है। प्रातःकाल आम भक्तों के लिए पट खुलने से पूर्व ही पुजारीगण पंचामृत अभिषेक, केसर-चंदन अंगराग और ऋतु के अनुकूल ताजे वन-पुष्पों से ठाकुर जी का नयनाभिराम शृंगार करते हैं।
क्योंकि वृन्दावन, मांट और नंदगाँव के सभी देवालयों में ग्रीष्मकालीन सेवा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन पूर्णिमा) और शीतकालीन सेवा (कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से फाल्गुन पूर्णिमा) के अनुसार दर्शन समय में 30 से 45 मिनट का अंतर आता है, इसलिए यात्रा से पूर्व 'तीर्थक ब्रज वैष्णव पंचांग' पर सूर्योदय एवं आरती का समय अवश्य देख लें।
दोपहर के राजभोग और रात्रि के शयन भोग के समय जब मंदिर के पर्दे लगते हैं, तब यह स्मरण कराया जाता है कि ब्रज में ठाकुर जी की सेवा किसी पाषाण या धातु की मूर्ति के रूप में नहीं, अपितु घर के साक्षात् जीवंत स्वामी और सुकुमार लाल के रूप में की जाती है।
ब्रज के प्राचीन रसिक ग्रंथों—जैसे श्री हित चौरासी, श्री केलिमाल, भक्तिरसामृतसिंधु और स्कंद पुराण के मथुरा माहात्म्य—में इस पावन तीर्थ की प्रत्येक सीढ़ी, झरोखे, वट-वृक्ष और सरोवर को जड़ पाषाण न मानकर साक्षात् चिन्मय (सच्चिदानंदमय) स्वरूप वर्णित किया गया है। संसार के अन्य ऐतिहासिक स्मारक समय के साथ केवल संग्रहालय बनकर रह जाते हैं, किंतु वृन्दावन, भांडीरवन और नंदगाँव की यह पावन भूमि आज भी प्रातः 04:30 बजे की मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन पर्यंत चलने वाली अखंड अष्टयाम सेवा से जीवंत रहती है। जब कोई श्रद्धालु यहाँ चंदन-केसर की सुगंध, पखावज और मंजीरों के साथ गूँजते समाज-गायन तथा तुलसी की माला फेरते ब्रजवासी संतों के दर्शन करता है, तो उसका हृदय स्वतः ही सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर अलौकिक आनंद में डूब जाता है।
3. 50 फीट ऊँचा शुद्ध स्वर्ण ध्वज-स्तंभ (गरुड़ खंभा), सप्त-प्राकार परकोटा एवं विशाल पुष्करिणी सरोवर
इस पावन स्थल की स्थापत्य कला और प्राचीन वृक्षों की संरचना में गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। धौलपुर के लाल बलुआ पत्थर, मकराना के संगमरमर और प्राचीन लाखौरी ईंटों से बने झरोखे, कमल-आकृतियाँ तथा वट-कदंब की झुकती हुई शाखाएँ यात्री के चंचल मन को शांत कर सीधे श्री विग्रह के चरणारविंदों में जोड़ देती हैं।
मुख्य गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा मार्ग, प्राचीन कूप (कुंड) और भजन कुटीरें स्थित हैं, जहाँ पिछले पाँच सौ वर्षों में अनगिनत सिद्ध संतों ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से नाम-जप किया है। जब आप शांत चित्त से "श्री राधे-श्याम" या "राधावल्लभ श्री हरिवंश" का उच्चारण करते हुए चार परिक्रमा लगाते हैं, तो आपके चरण उन महान संतों की चरण-रज से पवित्र हो जाते हैं।
वरिष्ठ नागरिकों और परिवारों के लिए प्रातः 06:30 से 09:30 बजे के मध्य का समय दर्शन के लिए सर्वोत्तम रहता है, क्योंकि इस समय वातावरण अत्यंत शांत रहता है और आप बिना किसी धक्का-मुक्की के गर्भगृह की देहरी के समीप खड़े होकर ठाकुर जी की रूप-माधुरी को निहार सकते हैं।
4. दैनिक पांचरात्र आगम पूजा विधि: तिरुप्पावै पाठ, गज-अश्व सवारी एवं दर्शन समय सारिणी
मुख्य मंदिर के अतिरिक्त इसके आसपास स्थित उप-तीर्थ, बैठकें और लीला-कुंज इस यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं। ब्रज के आध्यात्मिक मानचित्र में कोई भी मंदिर अकेला नहीं है; प्रत्येक देवालय वृन्दावन के कुंजों, नंदगाँव-बरसाना की पहाड़ियों और यमुना के घाटों को जोड़ने वाली एक दिव्य मणिमाला का हिस्सा है।
जब आप पास ही स्थित सरोवर या समाधि स्थल के किनारे दस मिनट शांत बैठकर स्वामी हरिदास जी, हित हरिवंश महाप्रभु, सूरदास जी अथवा रूप-सनातन गोस्वामी के पदों का स्मरण करते हैं, तब आपको अनुभव होता है कि आज भी इन वृक्षों के नीचे गोलोक की नित्य लीला अखंड रूप से चल रही है।
जो साधक अपनी यात्रा में दर्शन किए गए कुंडों, प्राचीन वट-वृक्षों और संतों की समाधियों का विवरण अपनी डायरी या 'तीर्थक ऐप' में संजोकर रखते हैं, उन्हें घर लौटने के बाद भी अपने दैनिक भजन और मानसी-सेवा में अद्भुत एकाग्रता प्राप्त होती है।
5. चैत्र मास का 10-दिवसीय ब्रह्मोत्सव: विशाल रथ यात्रा, आतिशबाजी और ऐतिहासिक "लठ्ठ का मेला"
वर्ष के बारह महीनों में यहाँ ऋतुओं के अनुसार भव्य उत्सव मनाए जाते हैं—ज्येष्ठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी में सुगंधित 'फूल बंगला' और 'चंदन यात्रा', श्रावण में 'हरियाली तीज हिंडोला', भाद्रपद में 'राधाष्टमी व जन्माष्टमी', आश्विन में 'शरद पूर्णिमा महारास', कार्तिक में 'दीपदान व नियम सेवा', पौष में 'खिचड़ी महोत्सव' और फाल्गुन में 'लठमार व फूलों की होली'।
यदि आप किसी सामान्य दिन भी यहाँ दर्शन करने आते हैं, तो संध्या आरती के समय पखावज, सारंगी और हारमोनियम पर गाए जाने वाले पारंपरिक 'समाज-गायन' और अष्टयाम पदों को सुनकर आपको साक्षात् उत्सव का ही दिव्य आनंद प्राप्त होगा।
फोटोग्राफी के शौकीन यात्रियों के लिए बाहरी प्रांगण, गोपुरम, सरोवर और प्राचीन वट-वृक्ष प्रातःकालीन सुनहरी धूप में अत्यंत सुंदर दृश्य प्रस्तुत करते हैं, जबकि मुख्य गर्भगृह में मोबाइल कैमरा बंद रखकर केवल नेत्रों से ही ठाकुर जी की छवि को हृदय में बसाना चाहिए।
ब्रज के प्राचीन रसिक ग्रंथों—जैसे श्री हित चौरासी, श्री केलिमाल, भक्तिरसामृतसिंधु और स्कंद पुराण के मथुरा माहात्म्य—में इस पावन तीर्थ की प्रत्येक सीढ़ी, झरोखे, वट-वृक्ष और सरोवर को जड़ पाषाण न मानकर साक्षात् चिन्मय (सच्चिदानंदमय) स्वरूप वर्णित किया गया है। संसार के अन्य ऐतिहासिक स्मारक समय के साथ केवल संग्रहालय बनकर रह जाते हैं, किंतु वृन्दावन, भांडीरवन और नंदगाँव की यह पावन भूमि आज भी प्रातः 04:30 बजे की मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन पर्यंत चलने वाली अखंड अष्टयाम सेवा से जीवंत रहती है। जब कोई श्रद्धालु यहाँ चंदन-केसर की सुगंध, पखावज और मंजीरों के साथ गूँजते समाज-गायन तथा तुलसी की माला फेरते ब्रजवासी संतों के दर्शन करता है, तो उसका हृदय स्वतः ही सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर अलौकिक आनंद में डूब जाता है।
6. वैकुंठ एकादशी पर वर्ष में एक बार खुलने वाला "वैकुंठ द्वार" और ग्रीष्मकालीन नौका विहार
मंदिर का तुलसी-मिश्रित चरणामृत, चंदन और मिट्टी के कुल्हड़/दोने में मिलने वाला 'महाप्रसाद' (जैसे पेड़ा, रबड़ी, मक्खन-मिश्री या मसालेदार खिचड़ी) ग्रहण करना ब्रज यात्रा का अनिवार्य अंग है। राजभोग और संध्या आरती के पश्चात मंदिर के अधिकृत प्रसाद पटल से ही महाप्रसाद प्राप्त करें।
निधिवन, राधा वल्लभ घेरा, भांडीरवन और नंदगाँव की सीढ़ियों पर बंदरों की संख्या अधिक होने के कारण अपने चश्मे (Eyeglasses), मोबाइल फोन और पर्स को वाहन से उतरने से पूर्व ही बैग के भीतर सुरक्षित रख लें। ब्रज के किसी भी जीव या वृक्ष को कष्ट न पहुँचाएँ और धाम की मर्यादा का पालन करें।
धाम-सेवा के अंतर्गत परिक्रमा मार्ग और कुंडों के घाटों पर प्लास्टिक या दोने-पत्तल न फैलाएँ, तथा यात्रा के प्रारंभ और समापन पर पावन 'ब्रजरज' को अपने मस्तक पर अवश्य धारण करें।
7. यात्री मार्गदर्शिका: शीश महल दर्शन, प्रवेश नियम, फोटोग्राफी सीमा एवं पहुँचने का मार्ग
यातायात की दृष्टि से अपनी यात्रा को भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार संयोजित करना सबसे बुद्धिमानी है। मध्य वृन्दावन के देवालयों (श्री राधा वल्लभ मंदिर, निधिवन राज और श्री रंगनाथ मंदिर) का दर्शन आप चुंगी चौराहा या विद्यापीठ चौराहे से ई-रिक्शा और पैदल मार्ग द्वारा एक ही पाली में सुगमता से कर सकते हैं।
दूसरी ओर, यमुना पार स्थित 'श्री भांडीरवन-बेलवन-मान सरोवर' अथवा 'बरसाना-नंदगाँव-टेर कदंब-पावन सरोवर' की यात्रा के लिए प्रातः 06:30 बजे वृन्दावन से निजी टैक्सी या ब्रज परिक्रमा वाहन लेकर निकलना उत्तम रहता है, जिससे आप दोपहर तक सभी लीला-स्थलों के दर्शन कर सायंकाल संध्या आरती के लिए पुनः वृन्दावन लौट सकें।
अपने स्मार्टफोन में 'तीर्थक (Teerthak) ऐप' अवश्य रखें, जिससे आपको ऑफलाइन जीपीएस मैप, ग्रीष्म/शीतकालीन मंदिर बंद होने का लाइव अलर्ट और आज का वृन्दावन वैष्णव पंचांग एक ही स्थान पर प्राप्त होता रहे—जय जय श्री राधे श्याम!
🇮🇳 हिंदी और Hinglish यात्री खोज सहायता (Hindi & Hinglish Pilgrim Guide)
श्री रंगनाथ मंदिर (रंगजी मंदिर) वृन्दावन संपूर्ण गाइड: 50 फीट स्वर्ण गरुड़ स्तंभ, दक्षिण भारतीय स्थापत्य, गोदा-रंगमन्नार कथा एवं रथ का मेला — यदि आप वृन्दावन, मथुरा, गोवर्धन या बरसाना यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो तीर्थक (Teerthak App) पर मंदिर खुलने और बंद होने का लाइव समय, मंगला और श्रृंगार आरती टाइमिंग, परिक्रमा जीपीएस मैप और एकादशी पंचांग हिंदी तथा अंग्रेजी में उपलब्ध हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: वृन्दावन के रंगजी मंदिर में भगवान रंगनाथ शेषनाग पर शयन करने के स्थान पर हाथ में छड़ी लेकर दूल्हे (रंगमन्नार) के रूप में क्यों खड़े हैं?
दक्षिण भारत की महान आलवार संत-कवयित्री श्री गोदांबा (आंडाल) ने भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना पति मानकर तिरुप्पावै की रचना की थी। उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीरंगम के शेषशायी भगवान रंगनाथ अपनी योगनिद्रा त्यागकर, हाथ में छड़ी (दंड) और सिर पर राजसी पगड़ी धारण कर वृन्दावन में दूल्हे (श्री रंगमन्नार) के रूप में खड़े हो गए और गोदांबा को अपने वाम भाग में स्थान दिया।
प्रश्न 2: क्या रंगजी मंदिर के प्रांगण में स्थित 50 फीट ऊँचा ध्वज-स्तंभ (खंभा) वास्तव में शुद्ध सोने से मढ़ा हुआ है?
हाँ! मुख्य गर्भगृह के ठीक सामने स्थित 50 फीट (लगभग 15.2 मीटर) ऊँचा यह विशाल ध्वज-स्तंभ देवदारु काष्ठ और तांबे के ऊपर मथुरा के सेठ लक्ष्मीचंद-गोविंददास परिवार द्वारा समर्पित शुद्ध सोने के मोटे पत्तरों से मढ़ा हुआ है, जिसकी कीमत आज सैकड़ों करोड़ रुपये है।
प्रश्न 3: वृन्दावन में श्री रंगनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया और इसमें दक्षिण भारतीय गोपुरम व राजपूत हवेली शैली का संगम क्यों है?
इस मंदिर का निर्माण सन् 1845 से 1851 ई. के मध्य मथुरा के प्रसिद्ध सेठ लक्ष्मीचंद के भाइयों—सेठ गोविंददास और सेठ राधाकिशन—ने अपने गुरु श्री वैष्णव आचार्य स्वामी रंगाचार्य जी की आज्ञा से उस समय के 45 लाख चाँदी के रुपयों की लागत से करवाया था। इसमें तमिलनाडु के श्रीरंगम की सप्त-प्राकार और गोपुरम शैली के साथ उत्तर भारत के राजपूती झरोखा द्वारों का अद्भुत संगम है।
प्रश्न 4: चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) में रंगजी मंदिर का प्रसिद्ध 10-दिवसीय "रथ का मेला" और "लठ्ठ का मेला" क्या है?
होली के तुरंत बाद चैत्र कृष्ण पक्ष में यहाँ 10 दिनों का भव्य दक्षिण भारतीय ब्रह्मोत्सव मनाया जाता है। इसमें ठाकुर जी विशाल चंदन के रथ पर विराजमान होकर रंगजी के बगीचे तक जाते हैं (रथ का मेला)। इसके अगले दिन "लठ्ठ का मेला" होता है, जिसमें पहलवान तेल और मक्खन लगे 45 फीट ऊँचे फिसलन भरे खंभे पर पानी की बौछारों के बीच चढ़कर शीर्ष पर रखा कलश जीतते हैं।
प्रश्न 5: वैकुंठ एकादशी की ब्रह्म मुहूर्त बेला में रंगनाथ मंदिर के "वैकुंठ द्वार" (स्वर्ग द्वार) के खुलने का क्या महत्व है?
तिरुपति और श्रीरंगम की भांति वृन्दावन के रंगजी मंदिर का उत्तरी द्वार—जिसे "वैकुंठ द्वार" कहते हैं—वर्ष के 364 दिन बंद रहता है। केवल वर्ष में एक बार वैकुंठ एकादशी की ब्रह्म मुहूर्त बेला (प्रातः 04:30 बजे) में यह द्वार खुलता है, जिसमें से ठाकुर जी की पालकी के पीछे निकलने वाले भक्तों को साक्षात् वैकुंठ धाम की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
तीर्थक (Teerthak) के साथ करें दिव्य ब्रज यात्रा
कभी भी दर्शन या आरती न छूटने दें। मंदिर खुलने-बंद होने का लाइव काउंटडाउन, भीड़ हीटमैप, ऑफलाइन 21 किमी गोवर्धन परिक्रमा जीपीएस, और प्रामाणिक वैदिक पंचांग हिंदी में।
स्रोत एवं संपादकीय टिप्पणी
यह लेख गौरव सिंह सोलंकी (संस्थापक व आध्यात्मिक शोधकर्ता) द्वारा शोधित है। मंदिर समय व सेवा नियमों में परिवर्तन संभव है; यात्रा से पूर्व मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि करें।
- जिला प्रशासन मथुरा (https://mathura.nic.in)
- श्री बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट (https://bihariji.org)
- प्रेम मंदिर आधिकारिक समय (https://premmandir.org.in)
- इस्कॉन वृन्दावन मीडिया सेल (https://iskconvrindavan.com)